"ऋणानुबंध"
‘ऋण’ यानी कर्ज और ‘अनुबंध’ है बंधन,
पूर्वजन्म का हिसाब है ये जीवन का दर्पण।
बिना किसी पुराने लेन-देन के कोई नहीं मिलता,
जो आया है जीवन में, वो कोई न कोई सिलता।
कोई माँ बनकर आता, कोई पिता कहलाता,
कोई संतान बनकर पुराना स्नेह चुकाता।
कोई मित्र बनकर साथ निभाने आता है,
कोई शत्रु बनकर बैर का हिसाब चुकाता है।
सबसे गहरा बंधन पति-पत्नी का माना जाता,
सुख-दुख का लेखा-जोखा वहीं पूरा होता।
हँसते-रोते, रूठते-मानते जो रिश्ते बनते हैं,
वो यूं ही नहीं, कई जन्मों के कर्म से सधते हैं।
जिससे अकारण मन खट्टा हो जाए,
समझो पुराना कोई कर्ज सिर पर आया है।
जिसे देखकर दिल अपने आप जुड़ जाए,
समझो कोई पुराना मेल फिर निभाने आया है।
ऋणानुबंध का चक्र तब तक घूमता रहता है,
जब तक सबका हिसाब पूरा नहीं होता।
नया जन्म, नया रूप, नया किरदार मिलता है,
और वही पुराना कर्ज फिर सामने होता है।
मुक्ति का मार्ग सरल है, सुनो मेरे मीत,
निष्काम सेवा करो, रखो क्षमा की रीत।
स्वार्थ छोड़कर जो दे दे, बिना बदले की आस,
उसका ऋण हल्का हो, टूटे बंधन का फांस।
इसलिए जो मिला है उसे प्रेम से निभाओ,
देना है तो दे दो, लेना है तो भुलाओ।
हिसाब चुकाकर ही आत्मा मुक्त होती है,
ऋणानुबंध मिटे तभी शांति की डोर मिलती है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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