पिता है तो ही ये सारा जहाँ अपना लगता है,
उसकी छाया तले ही जीवन सच्चा लगता है।
हर किसी के भाग्य में ये सानिध्य नहीं होता,
पिता के साथ जीने का सौभाग्य सभी को नहीं होता।
जब कभी बैठो पिता के समीप, तो थोड़ा मुस्कुरा दिया करो,
उस मौन तपस्वी के चरणों में कुछ पल बिता दिया करो।
उसने तुम्हारी एक हँसी के लिए अपना चैन गँवाया है,
खुद की इच्छाओं को मार, तुम्हारा भविष्य बनाया है।
उसने दिन को दिन नहीं समझा, रात को रात नहीं,
तुम्हारे सुख के आगे उसे अपनी कोई बात याद नहीं।
सच मानो, तुम्हें प्रसन्न देखकर ही वह पूर्ण हो जाता है,
तुम्हारी सफलता ही उसका अंतिम पुरस्कार कहलाता है।
इसलिए समय रहते उसके मूल्य को पहचान लो,
रूठने से पहले, उस पिता को गले से लगा लो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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