"परम प्रार्थना"
हे परमात्मा! तुम ही चर-अचर के स्वामी हो,
गत्यशील भी तुम, और स्थिर भी तुम नामी हो।
दिव्य सूर्य बनकर तुम, जग को तेज देते हो,
द्युलोक, भू, अंतरिक्ष को ऊर्जा से सींचते हो।
हे जगत आत्मा! मित्र बनकर प्रेम बरसाओ,
आह्लादित कर दो मन, हर तिमिर मिटाओ।
वरुण बनकर धर्म-नीति में हमको बाँध दो,
अग्नि बनकर पापों की मैल को भस्म कर दो।
तन माँगता आरोग्य, तेज और बल का दान,
मन माँगे सद्बुद्धि का निर्मल ज्ञान।
चित्त को रंग दो शुभ संकल्पों की हरियाली से,
आत्मा में गूंज उठे दिव्यता की ताली से।
तुम बिन कोई नहीं, तुम ही आदि-अंत हो,
कण-कण में समाए, तुम ही अनंत हो।
करबद्ध खड़ा हूँ, बस इतनी कृपा कर दो,
जीवन को अपने प्रकाश से पूरा भर दो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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