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पहले 'नहीं' को अंत मत समझो

                
                                                         
                            दुनिया याद नहीं रखती उनको,
                                                                 
                            
जो नए विचारों से डर जाते हैं।
किनारे पर खड़े होकर,
सिर्फ ताली बजाते हैं।

इतिहास नाम लिखता है उनका,
जो रास्ते खुद बनाते हैं।
अस्वीकृतियों की मार सहकर भी,
अपने सपने सजाते हैं।

पहला "नहीं" आए तो घबराना नहीं,
वो मंजिल का अंत नहीं।
वो तो बस दरवाजे की दस्तक है,
जो कहे "अभी और मेहनत कर"।

सीखते रहो, प्रयोग करते रहो,
नए ख्यालों को जन्म देते रहो।
गिरो तो उठो, टूटो तो जुड़ो,
विचारों का दीप जलाते रहो।

क्योंकि तुम्हारे एक प्रयोग से,
कल की पीढ़ी को साहस मिलेगा।
तुम्हारे एक नए रास्ते से,
किसी बच्चे का भविष्य बनेगा।

इसलिए पीछे मत देखो, आगे बढ़ते चलो,
भीड़ का हिस्सा मत बनो, इतिहास रचते चलो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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