"पाँच परतों में छिपा है तू"
प्याज सा लिपटा है जीवन, परत दर परत,
पाँच खोल में आत्मा, सबसे भीतर अमरत।
तैत्तिरीय ने कहा था, सुनो इसका भेद,
जो समझे इन कोषों को, मिट जाए हर खेद।।
पहला कोष है अन्न का, हाड़-मांस का चोला,
भूख-प्यास, रोग-बुढ़ापा, इसी में है तोला।
जो खाया सो देह बनी, अन्न से ही सारी काया,
सात्विक भोजन, योग से, होवे शुद्ध ये छाया।।
दूसरा कोष है प्राण का, साँसों की है डोरी,
प्राण, अपान, समान से चलती जीवन-लोरी।
थकान और स्फूर्ति इसी की माया है,
प्राणायाम, गहरी साँस से ये लौट के आया है।।
तीसरा मन का कोष है, भावों का संसार,
यही कहे मीठा-खट्टा, यही करे प्यार-दुलार।
चिंता, खुशी, गुस्सा, यादें इसी में बसतीं,
जप, ध्यान, सत्संग से ये मन की मैल धुलती।।
चौथा कोष विज्ञान का, बुद्धि का दरबार,
सही-गलत का भेद करे, कहे तू कौन, विचार।
अहंकार भी यहीं जगे, "मैं करता" का शोर,
स्वाध्याय, गुरु-वाणी से खुले ज्ञान का भोर।।
पाँचवा आनंद कोष है, सबसे सूक्ष्म सार,
न द्वैत, न चिंता, बस शांति की बहार।
गहरी नींद में जिसका आभास होता है,
ध्यान में वही आनंद, अमृत सा बोता है।।
हम अटके हैं पहले तीन में ही सारा दिन,
देह, साँस, मन के झगड़े में ही गिन-गिन।
साधना है यात्रा, बाहर से भीतर की ओर,
पाँचों घूँघट हटते ही, दिखे आत्मा का भोर।।
कोष हैं कपड़े, आत्मा है उनमें प्रकाश,
कपड़े बदलते रहते, प्रकाश रहे अविनाश।
जो खुद को देह, मन समझा, वो रोता है,
जो पाँचों पार गया, वो खुद को पाता है।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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