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नियति और साक्षी

                
                                                         
                            किसी के चले जाने से घर वैसे नहीं रहते,
                                                                 
                            
ख़ामोश हो जाते हैं वे घर जो कभी बातें किया करते।
आँगन सूना, दीवारें भी मौन हो जाती हैं,
बातें आधी रह जाती हैं, कहानियाँ खो जाती हैं।

मैंने बहनों को विदा होते देखा, एक भाई को खोया,
पिता की छाया, माँ की ममता, सबको रुखसत होते देखा।
जीवनसंगिनी का हाथ भी एक दिन छूट गया,
और नियति ने सब कुछ पल में लूट लिया।

बहुत कुछ सहना पड़ा, बहुत कुछ सीखना पड़ा,
हर बिछोह ने भीतर एक नया पाठ लिखा।
क्योंकि परिवर्तन ही इस सृष्टि का नियम है,
जो आज पास है, वो कल नहीं, यही प्राचीन कृत्य है।

नियति निष्ठुर है, वह चुनकर नहीं आती,
बिना पूछे ले जाती है, बिना बताए जाती है।
पर उसके जाल में उलझकर हम खुद को न तोड़ें,
हर आँसू को ज्ञान का दीप बनाकर छोड़ें।

मैं साक्षी हूँ आने का, मैं साक्षी हूँ जाने का,
न मेरा कोई, न मैं किसी का, बस खेल है आने-जाने का।
तटस्थ होकर देखो तो दुख भी अपना रूप बदलता है,
और हर बिछोह में आत्मा का प्रकाश निकलता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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