रिश्तों की हैं पाँच सीढ़ियाँ, सबको ये पता है,
देखना, अच्छा लगना, चाहना, पाना और निभाना।
पहली चार तो मिल जातीं संयोग और चाहत से,
पाँचवी सीढ़ी सबसे ऊँची, सबसे कठिन ठिकाना।
देखना आसान है, नज़रें मिल जाती हैं,
अच्छा लगना आसान, बातें खिल जाती हैं।
चाहना में दिल धड़कता, पाने में खुशी होती,
पर असली परीक्षा तब जब रोज़ की ज़िम्मेदारी होती।
रिश्ते साँस लेते हैं विश्वास की हवा से,
त्याग, धैर्य, सम्मान के जल से सींचा जाता।
संवेदना की डोर से बंधते दो दिल आपस में,
एक-दूसरे के मौन को भी जो समझ ले वही सच्चा।
समय कसौटी बनता, परिस्थिति आकर टकराती,
मतभेद की आँधी में भी जो साथ न छोड़े वही निभाता।
आकर्षण मुरझा जाता, अवसर बदल जाता है,
पर जो हर हाल में थामे, वही रिश्ते की गरिमा पाता है।
बनाना संयोग है, चलाना एक कला है,
प्रेम, विश्वास, व्यवहार की ही सबसे बड़ी माला है।
जो निभाना जान गया वो संस्कारों का दीप है,
उसी के जीवन से दुनिया को रिश्तों की सीख है।
इसलिए सीढ़ी पाँचवी पर पाँव संभाल कर रखना,
मिलना आसान है जगदीश, पर निभाना सीख लेना।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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