"नदी का स्वभाव"
नदी का स्वभाव भी इंसान सा होता है,
हर मोड़ पर जीवन का आईना होता है।
उद्गम पर किलकती है नन्हे शोर सी,
पहाड़ों से उतरे बालक की दौड़ सी।
उछले, गिरे, पत्थरों से टकराए,
बचपन की धुन में बस आगे बढ़ जाए।
युवावस्था में मैदानों को छूती है,
तेजी से चले, किनारों को भी कूटती है।
बल खाए, इधर-उधर ताक-झांक करे,
जवानी का जोश हर बंधन को तोड़े।
प्रौढ़ होकर गति को थोड़ा धीमा करे,
जिम्मेदारी का बोझ कंधों पर धरे।
दूर-दूर तक सींचे खेत और गाँव,
गंभीर होकर बहती है, संभालती है ठाँव।
वृद्धावस्था में धार बिल्कुल मंद पड़े,
शाखाओं में बंटे, शक्ति भी क्षीण पड़े।
डेल्टा बनाकर आखिर सागर में मिले,
जीर्ण सी देह लेकर जीवन पूरा खिले।
बाल, युवा, प्रौढ़, वृद्ध — यही चार अवस्था,
नदी और मनुष्य की एक ही है कथा।
— जगदीश प्रसाद शर्मा
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