"मुझे अमृत पिला दे"
असत् में चल-चल के मैं थक गया हूँ,
अंधकार-मृत्यु से डर-डर थक गया हूँ।
हे करुणानिधान, अब द्वार खोल दे,
मेरे थके जीवन को, अमृत से तोल दे।
पहला अमृत अन्न दे, प्रसाद जैसा,
देह नहीं, अन्नमय को जीवंत वैसा।
दूसरा प्राण दे, सम और लय वाला,
श्वास नहीं, प्राण को स्पंदन देने वाला।
तीसरा ज्ञान दे, ऋतम्भरा वाला,
तर्क नहीं, अनुभूति में जीने वाला।
जो आत्मा को निर्भय कर जाए,
भय का अंधकार हर जाए।
चौथा आनंद दे, निरपेक्ष-रस वाला,
अंतःकरण में झरने-सा बहने वाला।
पाँचवाँ करुणा दे, मृडय नः जैसी,
अहंकार गला दे, बर्फ पिघले वैसी।
छठा प्रेम दे, मधुमान् नः प्यारा,
द्वैत मिटा दे, एक करे सारा।
सातवाँ सोम दे, तादात्म्य रूप,
नर-नारायण एक हों, मिटे भेद-कूप।
अब अपना द्वार खोल, हे नाथ मेरे,
सात धाराओं से भर, घाट मेरे।
जो घटे ना, छूटे ना, मिटे ना कभी,
मैं मिट जाऊँ, तू रहे बाकी सभी।
मैं मिटूँ, तू ही तू शेष रहे,
ब्रह्मनाद बनकर, तू ही गूँज रहे।
ॐ सोमं पिबतं, मादयध्वम्,
मैं तुझमें घुल जाऊँ, तू ही हो सर्वम्।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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