मेघ आते हैं, चले भी जाते हैं,
मानव निहारते नभ की ओर रह जाते हैं।
काले बादल घिरते हैं पर बरसते नहीं,
धरती की प्यास बूझे, ऐसी आस जगते नहीं।
कब टूटेगा गहराए इन मेघों का मौन,
कब धरती मां तृप्त होगी जाने कौन?
सूखे खेत पुकारते, दरकती है माटी,
बूँद-बूँद को तरसे हर एक पाती।
कब फैलेगी हरियाली चारों ओर,
कब गूंजेगा कोयल का मधुर शोर?
कब भीगेगी ये प्यासी धरती सारी,
कब लहराएगी खेतों में बालियाँ हरी-भरी?
इंतज़ार में पल-पल बीतते जाते,
आशा के दीप मन में फिर भी जलते जाते।
हे मेघराज, अब मौन तोड़ दो,
धरा पर अमृत सी वर्षा छोड़ दो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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