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मर्यादा की डोर

                
                                                         
                            जब-जब स्त्री तोड़े मर्यादा की डोर,
                                                                 
                            
प्रभाव उसका थमता नहीं एक छोर।
घर, समाज और पीढ़ियाँ सब झेलती हैं,
एक चूक की गूँज सदियों तक चलती है।

भारतीय संस्कृति का यही श्रृंगार है,
आभूषण नहीं, चरित्र ही सबसे बड़ा सार है।
लज्जा, शालीनता और धर्म की पहचान,
स्त्री के मान से ही घर का सम्मान।

सोशल मीडिया ज्ञान का बड़ा साधन है,
प्रेरणा और सेवा का सशक्त माध्यम है।
पर कुछ लोग सस्ती वाहवाही को चुनते हैं,
अशोभनीय प्रदर्शन से नाम को गिनते हैं।

एक प्रश्न है बस उनसे मेरा,
सोचा कभी संदेश कैसा जाएगा तेरा?
युवा क्या सीखेंगे, कल क्या बनेगा,
तेरे आचरण से समाज कैसा सजेगा?

स्वतंत्रता का मतलब मर्यादा तोड़ना नहीं,
अधिकार के साथ कर्तव्य जोड़ना है कहीं।
सम्मान माँगने से कभी नहीं मिलता,
वो आचरण और संस्कार से खुद खिलता।

इसलिए अपनी मर्यादा को कभी मत भूलो,
चरित्र की चमक से जग को तुम छू लो।
यही सच्ची शक्ति, यही सच्चा मान है,
यही नारी का सबसे बड़ा अभिमान है।
— जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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