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मन का विश्राम

                
                                                         
                            जैसे साधु शास्त्रों से सार निकाल लेता है,
                                                                 
                            
जैसे भंवरा कांटे छोड़ मधु ही चुनता है।
वैसे ही हम भी गुणों का संग्रह करें,
दुर्गुणों को अनदेखा करके रिश्ते सँवारें।

कमियां सब में हैं, सबको सहना पड़ता है,
झगड़े समझ की कमी से अक्सर बढ़ता है।
कभी समझ नहीं पाते, कभी समझा नहीं पाते,
इसी बीच अपनापन कहीं खो जाता है।

रिश्ते पौधे जैसे, प्यार की खाद माँगते हैं,
मुलाकात का पानी, बातों की धूप चाहते हैं।
अपनत्व की हवा न मिले तो झड़ जाते हैं,
समय से पहले ही पत्ते बिखर जाते हैं।

शरीर थके तो आराम से ठीक होता है,
मन की थकान भीतर-भीतर रस सोखता है।
वो दिखती नहीं, पर उत्साह ले जाती है,
और सही निर्णय की राह भटका जाती है।

इसलिए थोड़ा धीमे हो, थोड़ा मौन साधो,
थोड़ा अर्थपूर्ण संवाद से मन को साधो।
हर थकान कमजोरी नहीं, चेतावनी होती है,
गति बदलने का समय यही बताती है।

विश्राम दो मन को, यही बुद्धिमानी है,
मन सँवर जाए तो जीवन में शांति आती है।
जब मन को पोषण मिले, स्थिरता लौट आए,
तब हर रास्ता अपना और सुखद लग जाए।
— जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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