आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं से बेहतर मैं

                
                                                         
                            "मैं से बेहतर मैं"
                                                                 
                            

जीवन दौड़ नहीं, आगे निकलने की,
यह यात्रा है, खुद को निखारने की।
हर किसी की राह, अलग ही होती,
हर किसी की गति, अलग ही होती।

किसी की नकल से, छोटा मत बनो,
किसी से जीत कर, झूठा मत तनो।
तुलना से मन, अशांत होता है,
आत्ममंथन से मन, प्रशांत होता है।

प्रतिस्पर्धा जन्म दे, अहंकार को,
आत्म-सुधार गढ़े, साकार को।
होड़ लगानी है तो, कल से लगाओ,
कल के 'मैं' को, आज से हराओ।

कल जहाँ मन में, असमंजस था भारी,
आज वहाँ लाओ, स्पष्टता प्यारी।
कल जिस बात ने, तुम्हें विचलाया था,
आज उसी से तुमने, धीरज पाया था।

आज एक छोटा सा, संकल्प लो,
कल से बेहतर, खुद को बना लो।
मेरे विचार हों, और सकारात्मक,
मेरा कर्म हो, थोड़ा परोपकारात्मक।

मेरे व्यवहार से, रोशनी जुड़ जाए,
किसी के अंधेरे में, दिया जल जाए।
कल से बेहतर आज, आज से बेहतर कल,
यही साधना हो, यही हो हल।

न किसी से आगे, न किसी से पीछे,
बस अपने ही भीतर, हम रोज़ सींचें।
जो खुद से जीते, वही सिकंदर है,
आत्म-सुधार ही, सच्चा अंदर है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर