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मैं जगा हूँ

                
                                                         
                            "मैं जगा हूँ"
                                                                 
                            

ईश्वर, सुनो, मैं थका नहीं हूँ,
मैं तो अब सोकर, जगा हूँ।
बहुत भटका बाहर, द्वार-द्वार,
अब देखा भीतर, तेरा घर-द्वार।

देखा मैंने, द्रष्टा अलग है,
दृश्य अलग है, नाता अलग है।
ॐ सह नाववतु - हम साथ चलें,
तू दिखाए, मैं बस देखूँ भले।

अंधेरा मेरा है, दीया तेरा है,
जलाने वाला तू, मैं तो चेरा है।
मैं देह नहीं हूँ, मन भी नहीं,
मैं जीव हूँ, तेरा पुत्र ही सही।

तुझसे अलग हूँ, पर तुझमें ही हूँ,
टहनी जैसा, तेरे वृक्ष में ही हूँ।

यज्ञ किया - कर्तापन तुझे दिया,
मैं करता नहीं, तू ही करता जिया।
तप किया - भोक्तापन तुझे दिया,
सुख-दुख तेरा, मैंने न लिया।

दान किया - 'मेरा' छोड़ दिया,
ज्ञान हुआ - 'मैं ही सब हूँ' तोड़ दिया।
नेति नेति कर, सब छूट गया,
जो न छूटा, वो तू ही बचा।

अब मौन ही मेरी, प्रार्थना है,
अब ठहरना ही, उपासना है।
ॐ आत्मानं विद्धि - खुद को जाना,
मैं ब्रह्म नहीं हूँ, तेरा हूँ, ये माना।

नाहं ब्रह्म, तवैव अहं।
मैं तू नहीं, पर तेरा ही तो हूँ।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
15 घंटे पहले

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