"मैं शरीर नहीं हूँ"
मैं पंचतत्व का ये तन नहीं, मैं मिट्टी का खिलौना नहीं,
मैं मन के भावों की भीड़ नहीं, मैं साँसों का बंधन नहीं।
मैं वो चेतन ज्योति हूँ, ईश्वर का ही अंश प्रकाश,
सत्य, चेतना, आनंद का, मुझमें बसता है वही निवास।
धरा पे आया हूँ थोड़े दिन, कुछ भूमिका निभाने को,
रिश्ते, कर्म, धर्म के धागे, प्रेम से बुन जाने को।
जैसे वस्त्र पुराने तजकर, नए वस्त्र हम धारण करें,
वैसे ही ये देह बदलती, आत्मा फिर नव रूप धरे।
शरीर जड़ है, माटी-माटी, पानी-अग्नि-वायु-आकाश,
इसके बिना भी मैं चलता, क्योंकि मुझमें है चेतन प्रकाश।
"मेरा हाथ, मेरा मन" कहते, तो स्पष्ट भेद दिख जाए,
जो बोल रहा है "मैं" भीतर, वो इन सबसे न्यारा आए।
जैसे किरण सूर्य की छोटी, पर सूरज सी दमके,
वैसे ही मैं परम पिता की, अंश मात्र से चमके।
आग जला न सके मुझको, जल मुझे भिगो न पाए,
जन्म-मृत्यु का चक्र झूठा, मैं तो अजर-अमर कहलाए।
जब तक तन को "मैं" मानूँ, भय और दुख सताते हैं,
जिस दिन जानूँ "मैं चेतना", सारे बंधन टूट जाते हैं।
इसलिए कहता हूँ आज, सुनो जगत के साथी,
मैं शरीर नहीं हूँ, मैं हूँ वो, जो लौटेगा अपने स्वामी।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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