"मैं कौन हूँ?"
मैं कहता हूँ मेरा हाथ, मेरी काया,
फिर कहने वाला कौन, जो दे रहा है साया?
शरीर कहे मैं हूँ, पर वो तो बदलता है,
बचपन गया, जवानी गई, फिर भी मैं ही रहता है।
स्वप्न में शरीर तो शैय्या पर सोता है,
फिर दौड़ता कौन है, जो हँसता-रोता है?
गहरी नींद में जब कुछ भी पता नहीं,
जाग के कहता कौन - मैं सोया वहीं?
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति - तीनों बदल जाएँ,
पर कहने वाला "मैं" तो वही रह जाए।
मैं मन नहीं, मन तो मेरा भटकता है,
मैं भाव नहीं, भाव तो आता-जाता है।
अन्नमय, प्राणमय, मन से भी परे,
कोई साक्षी बैठा सबको देखे खड़ा द्वारे।
नाम नहीं, जाति नहीं, केवल "मैं हूँ" सार,
उसके बाद ही जुड़ते हैं सारे श्रृंगार।
शरीर सत्य है, उसका धर्म निभाना है,
पर शरीर में रहकर, शरीर से परे जाना है।
तो आज रात खुद से इतना पूछ लेना,
"मेरा" कहने वाला "मैं" कौन है, ढूंढ लेना।
शरीर को जानना विज्ञान कहलाता है,
"मैं कौन हूँ" जानना ही ज्ञान कहलाता है।
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