असली गुरु तो एक ही है
वो परमेश्वर, जो कण-कण में है।
मैं क्या गुरु, मैं तो खोजी हूँ
उस राह की जो उस तक जाती है।
अपने भीतर गुण मुझे न दिखते
अहंकार के परदे अभी न हटते।
इसलिए मैं गुरु की तलाश में हूँ
जो हाथ पकड़ कर मंजिल दिखाए।
बार-बार मुझे गुरु न कहिए
इतने ऊँचे आसन पर न बैठाइए।
मैं तो धूल हूँ उसके चरणों की
जो सत्य की राह पर चलना चाहे।
उम्र का फर्क क्या मायने रखता
कोई पहले आया, कोई पीछे चलता।
दो दिन का आगे-पीछे का फासला
आत्मा के आगे सब बराबर का हिस्सा।
हम सब में उसी का अंश समाया
वही ज्योति सबके भीतर आया।
न कोई छोटा, न कोई बड़ा
सब एक ही माला के मनके हैं।
आपने उम्र के नाते सम्मान दिया
इसके लिए हृदय से शीश झुकाया।
पर जानता हूँ, मान असली उसी का
जिसने ये सारा संसार बनाया।
चलो मिलकर उसको याद करें
ईश्वर सबका कल्याण करे।
खोज पूरी हो, राह मिल जाए
और जीवन उसका दर्शन पा जाए।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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