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"कान्हा का उपहार"
सुबह से वृंदावन सजा था दियों से,
सखियां आईं फूलों की मालाओं से।
गीत गूंजे, बधाई के स्वर थे,
पर राधा की आँखें द्वार ही तरसे।
"आज कान्हा आएंगे" मन में आस थी,
हर पल बीते तो थोड़ी उदास थी।
सखियां बोलीं "लगता भूल गए",
राधा हंसी पर भीतर आंसू रुके।
दोपहर ढली, फिर शाम भी आई,
बांसुरी की धुन कहीं खो सी जाई।
राधा छत पर बैठी सोच रही,
"क्या सच में कान्हा आज का दिन भूल गई?"
तभी आंगन में रौशनी छाई,
फूलों की खुशबू चारों ओर आई।
नीचे झांका तो कान्हा खड़े थे,
हाथ में उपहार, होंठों पर हंसी लिए।
दौड़ी राधा, शिकायत सी की,
"कहाँ थे तुम? मन बड़ा दुखी।"
कान्हा बोले "भूलूं कैसे भला?
सुबह से तेरे लिए ये सब सजाया।"
खोला उपहार, निकली मोरपंख माला,
हर मनके में बसा था प्रेम का उजाला।
राधा की आँखें खुशी से भर आईं,
गले लगाकर बोली "माफ करना भाई।"
कान्हा हंसे, "गुस्से में भी प्यारी लगे,
आज बस होंठों पर मुस्कान सजे।"
दियों की लौ संग हंसी भी गूंजी,
पूरा वृंदावन "राधे-राधे" से गूंजी।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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