"जीवन-संध्या"
पचास-साठ वसंत जब बीत जाते हैं,
दो पहियों का रथ सहज ही चल पाता है।
दुख आधे हो जाते, बोझ बंट जाता है,
साँझ की एक मुस्कान थकान मिटा जाता है।
"आज बहुत दौड़े" दो शब्द कह लेने से,
जन्मों का सुकून एक साँस में मिल जाता है।
पति-पत्नी साथ हों तो समय का पता नहीं,
चाँदी सिर में कब आई, एहसास ही नहीं।
पर नियति का हाथ जब एक को ले जाता है,
तब जीवन की सबसे कठोर परीक्षा आता है।
जो कंधा दुख में था, वो अब स्मृति बन जाए,
जो हाथ चाय देता था, वो तस्वीर बन जाए।
समाज का दर्पण और भी निर्मम हो जाता,
हँसी भी गुनाह लगे, मौन भी काटे जाता।
घर में भी अब पूछ कोई नहीं होती,
इच्छा अपनी भी अब दूसरों की होती।
पर शून्य को जो ईश्वर से भर लेता है,
उसकी पीड़ा की धार कुछ कुंद पड़ता है।
अकेलापन भी एक तप बन जाता है,
जो सह ले वही भीतर से मज़बूत हो पाता है।
साथ केवल देह का नहीं होता जग में,
साथ यादों का, संस्कारों का, सपनों का भी होता।
जब तक साथी साथ है उसे सामान्य मत मानो,
उसकी डाँट, उसकी हँसी ही असली खज़ाना जानो।
और यदि अकेलेपन में जीवन डाल दिया,
तो समझो ईश्वर ने "मैं" से "हम" तक बुला लिया।
ईश्वर, सेवा, स्मृति, स्वाध्याय के चार स्तंभ,
इन पर टिककर साँझ भी बन सकती सवेरा।
जो हाथ छूट गया वो तारा बन गया,
बची साँसें उसी की रोशनी में आगे चला।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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