"हे सर्वस्व! तुझे समर्पण"
परमात्मा! तेरी कैसी सुंदर ये सृष्टि है,
सब अपने से लगते, यही तो दृष्टि है।
ये मेरा परिवार, ये मेरा घर प्यारा,
ये मेरी संपत्ति, ये मेरा मान सारा,
ये मेरी काया, ये मेरे सपने सारे,
लगते थे मेरे, बड़े ही न्यारे।
पर हाथ से सब फिसलते जब देखा,
तब ज्ञान का एक दीप सा लेखा।
जाना मैंने, मेरा कुछ भी नहीं है,
जो कुछ है, सब तेरा ही तो यहीं है।
वेद पुकारे, भूमा में सुख भारी,
अल्प में नहीं, विराट में सुख सारी।
गीता गाये, सुन अर्जुन प्यारे,
यत् करोषि यद् अश्नासि न्यारे।
जो भी करे, जो भी तू खाये,
हवन करे या दान दिलाये,
तप करे जो, कर्म कमाये,
सब मुझको अर्पण कर जाये।
इसलिए हे मेरे सर्वस्व, सुनो ये वाणी,
जो मेरा कभी था ही नहीं, उसकी क्या कहानी।
मेरा भोजन, मेरी निद्रा, मेरा तप, मेरा यश,
मेरा हर कर्म, हर पल, हर अटपटा हरश।
सब तुझे अर्पण, सब तुझे अर्पण,
तेरे चरणों में मेरा सारा दर्पण।
मेरा राग, मेरा द्वेष, हर्ष और शोक,
मेरा मोह, मेरी चिंता, मेरा हर भोग।
अग्नि में आहुति जैसे जलते,
वैसे तुझमें सब भेंट चढ़ते।
और सुनो, मेरा होना ही तुझसे है,
मेरी साँस की डोरी भी तुझसे है।
तो जब सब तेरा, तो मैं भी तेरा,
मेरा मैं भी तुझे अर्पण, सवेरा।
काया से, वाणी से, मन से जो हो,
इन्द्रियों से, बुद्धि से, आत्मा से जो हो,
स्वभाव वश जो भी मैं करता,
वह सब तुझको ही मैं धरता।
हे अंतर्यामी! अब इतनी कृपा कर दो,
मेरा भीतर शुभ्र, शांत, शाश्वत भर दो।
इतना निर्मल कर दो मेरा मन,
समर्पण ही बन जाये मेरा जीवन।
तेरी संतृप्ति, तेरी विभूति, तेरी अनुभूति पाऊँ,
तेरी प्राप्ति का अधिकारी बन जाऊँ।
मैं नहीं, तू ही तू, बस यही भाव रहे,
त्वया वयं धारा महः, यही नाद बहे।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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