"हर ठोकर एक सबक है"
किताबों से सीखा बहुत, इतिहास से ज्ञान मिला,
दूसरों की गलतियों से भी, कुछ हुनर पहचान मिला।
पर सबसे गहरी सीख जो, अपने गिरने से आती है,
अपनी ठोकर ही इंसान को, असल समझदारी सिखाती है।
सोचा था उपकार करेंगे, जग में रोशन नाम होगा,
दे देंगे तन-मन-धन भी, बदले में सम्मान होगा।
पर जिसके लिए दिया सब, उसी ने पीठ दिखाई,
उपकार को एहसान न माना, बेइज्जती ही ठहराई।
पहले दुख हुआ, फिर समझ आया ये खेल कैसा है,
हर रिश्ता सौदा नहीं, हर आदमी हमजैसा नहीं है।
सीमा तय करना सीखा, परोपकार की भी एक लकीर है,
अंधे होकर दान न दो, वरना कृतघ्नता ही तस्वीर है।
गिरकर ही चलना आया, टूटकर ही जुड़ना सीखा,
धोखा खाकर ही जाना, कौन अपना कौन पराया।
इसलिए जो भी ठोकर लगे, उसे कोसना व्यर्थ है,
क्योंकि सच तो यही है साथियों, हर ठोकर एक सबक है।
मुश्किलें तराशती हैं हमें, जैसे मूर्तिकार पत्थर को,
हर चोट के बाद ही निखरता है, इंसान का भीतर को।
इसलिए गिरो, संभलो, फिर उठो, यही जीवन का सार है,
ठोकरें ही गुरु हैं, और अनुभव ही उपहार है।
-- जगदीश प्रसाद शर्मा
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