"हाथ पकड़ ले प्रभु"
हे ईश्वर, वेद पुकारते हैं — "सत्यं वद, धर्मं चर",
पर धर्म क्या है, ये समझ न पाऊँ मैं।
ग्रंथ पढ़े, प्रवचन सुने, तर्क भी लड़ा,
फिर भी उलझन में ही भटकता रह जाऊँ मैं।
दे दे वो विवेक, जो झूठ-सच में भेद करे,
दे दे वो ज्ञान, जो धर्म-अधर्म को पहचान ले।
जो राह बताए सत् की, कर्तव्य की, करुणा की,
और हर कदम पर मुझको संभाल ले।
तू भूः में है, तू भुवः में है, तू स्वः में है,
तू कण-कण में, पल-पल में समाया हुआ है।
आकाश में, पाताल में, मन के भीतर भी,
हे सर्वव्यापी, तू ही तो छाया हुआ है।
इसलिए हे प्रभु, अबोध बालक समझकर,
मेरा हाथ पकड़ कर धर्म-पथ पर ले चल।
न मैं गिरूँ, न मैं भटकूँ, न मैं थकूँ,
बस तेरी उंगली थामे आगे बढ़ता चल।
दे शक्ति, दे तेज, दे वो कर्म-बल,
कि जो करूँ वो धर्मानुसार हो।
न स्वार्थ हो उसमें, न कपट हो उसमें,
बस सेवा, समर्पण, और प्यार हो।
सत्कर्मों की नाव बना दे जीवन को,
उसी के सहारे तेरे तट तक आ जाऊँ।
जहाँ न कोई प्रश्न हो, न कोई उत्तर,
बस परमानंद में डूबकर खो जाऊँ।
हे प्रभु, "सत्यं वद" मेरी वाणी बने,
"धर्मं चर" मेरा आचरण बने।
और जब जीवन संध्या आए,
तो तेरा नाम ही मेरा शरण बने।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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