आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

घर का संतुलन

                
                                                         
                            रोटी कमाने वाला दिनभर मेहनत से हारा है,
                                                                 
                            
रोटी बनाने वाला प्रेम से घर को संवारा है।
दोनों थकते हैं, दोनों का पसीना बहता है,
तुलना की तराजू यहाँ किस काम आती है?

कोई बाहर की जिम्मेदारी कंधे पर ढोता है,
कोई चूल्हे-चौके में अपनापन जोड़ता है।
एक की दौड़ से घर का खर्चा चलता है,
दूसरे की ममता से घर में चैन पलता है।

हिसाब लगाओगे तो रिश्ते कमजोर होंगे,
इज्जत दोगे तो बंधन और मज़बूत होंगे।
काम छोटा-बड़ा नहीं, नीयत बड़ी होती है,
दोनों के बिना गृहस्थी आधी-अधूरी होती है।

जहाँ सम्मान की बोली, समझ की बात होती है,
वहीं घर में सुख की बरसात होती है।
प्रेम की नींव पर जो परिवार खड़ा होता है,
वहीं असली अपनापन हर कोने में दिखता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर