"धृति ही धर्म है"
विषम घड़ी हो, चाह अधूरी हो,
मन अधीर हो, राह न पूरी हो,
तब हम डगमग होते, टूटते हैं,
विद्वान पर तब भी न छूटते हैं।
वेद ने जिसको धृति पुकारा,
अर्थ वही जो मन को संभारा,
टूटने न दे, गिरने न दे,
अंधेरे में भी संवरने न दे।
शास्त्र कहता, सुनो विधान है,
धृति क्षमा दमो धर्म महान है,
धर्म का पहला लक्षण यही,
आत्मा को थामे, स्खलन नहीं।
गीता बोली, हे पार्थ प्यारे,
योग अविचल हो तो संकट हारे,
निष्काम योग से सात्विकी धृति,
मन प्राण इंद्रिय रखे सुमति।
ऐसी धृति जो कभी न टूटे,
भय से, लोभ से कभी न छूटे,
जो सन्मार्ग पर डटी रहे,
हर तूफान में अडिग बहे।
हे सर्वशक्तिमान, करो कृपा,
दो ऐसी धृति, दो ऐसी छाया,
श्रद्धा सत्य तप योग अटूट,
हममें धृति का दीप न छूट।
मन स्थिर हो, प्राण स्थिर हो,
भय मिटे, अभय ही स्थिर हो,
ऐसी स्थिरता में बोध जगे,
विषम भी समता में लगे।
अपूर्ण में भी पूर्ण दिख जाये,
कांटों में भी फूल खिल जाये,
दुख भी आए तो दुख न लगे,
धृति हो तो सब सुख लगे।
धैर्य से धारणा बन जाती है,
धारणा से ध्यान सज जाती है,
ध्यान में तेरा बोध मिले,
जीवन सारा धन्य हो चले।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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