"धर्म और नैतिकता"
धर्म और नैतिकता का नाता पुराना है,
जड़ें एक ही धरती में, पर फूल दो रंगों वाला है।
जहाँ मिलते हैं दोनों:
धर्म कहता दया करो, नैतिकता भी यही कहे,
धर्म कहता सत्य बोलो, अंतरात्मा भी वही सहे।
कर्तव्य का नाम ही धर्म, गीता भी यही बताती,
नैतिकता भी पूछे रोज़, "क्या सही, क्या गलत है आती।"
अच्छे कर्म का फल मीठा, बुरे का दंड विधान,
धर्म का भय रोके पाप को, नैतिकता का भी यही ज्ञान।
प्रेम, क्षमा, अहिंसा के, दोनों ही हैं पुजारी,
मानवता की बगिया में, दोनों हैं रखवारी।
जहाँ अलग हो जाते हैं:
धर्म बंधा रीति-रिवाज में, परंपरा की डोर से,
नैतिकता चलती तर्क से, समय की हर भोर से।
एक माने ईश्वर को, दूजा माने इंसान को,
एक देखे स्वर्ग-नरक को, दूजा देखे सम्मान को।
कोई धर्म न माने फिर भी, भला-बुरा वो समझे,
बिना मंदिर जाए भी, वो राह नेकी की गढ़े।
कभी रीति टकराए जब, आज की सोच से,
तब नैतिकता पूछती है, "क्या ये ठीक है सोच से?"
निष्कर्ष:
धर्म दीपक है, नैतिकता उसकी लौ कहलाती,
दीपक बिना लौ अंधेरी, लौ बिना दीपक बुझ जाती।
एक है आस्था का पथ, दूजा विवेक का साथी,
दोनों मिल जाएँ तो, जीवन बन जाए सच्चा साथी।
इसलिए झगड़ा कैसा, कौन बड़ा कौन छोटा,
जब इरादा नेक हो तो, हर मार्ग ही है मोटा।
'जगदीश' बस इतना जाने, यही जीवन का सार,
धर्म से नैतिकता उपजे, और नैतिकता से उपकार।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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