दीपक सा जीवन
मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है, पर सम्पूर्ण नहीं,
संपूर्ण तो ये है कि यात्रा कितनी सार्थक रही।
हमारे कर्मों से कितनों में उजाला उतरा,
हमारे व्यवहार से कितने दिल तक नाता जुड़ा।
दीपक का बुझना निश्चित है, ये प्रकृति का नियम,
पर बुझने से पहले उसने कितना अंधकार किया कम।
कितनों को राह दिखाई, कितनों में आशा जगाई,
यही तो उसके होने की असली कीमत कहलाई।
मनुष्य की कीमत भी बरसों से नहीं मापी जाती,
चरित्र से, सेवा से, प्रेम और करुणा से जानी जाती।
जीवन की लंबाई नहीं, उपयोगिता अमर होती,
सद्कर्मों की खुशबू ही मिट्टी में भी महकती।
इसलिए ऐसा जियो कि तन भले एक दिन मिट जाए,
पर संस्कार और स्मृतियाँ दीपक-सी लौ बन जाएँ।
तुम न रहो इस जग में, पर नाम तुम्हारा जिए,
लोगों के हृदय में प्रकाश बनकर सदा जिए।
-- जगदीश प्रसाद शर्मा
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