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दीपक जलता रहे

                
                                                         
                            तेल घट गया, बाती आधी रह गई, हवा के थपेड़े भी तेज़ हो गए।
                                                                 
                            
लोग कहते हैं — "अब बुझने दो इसे, रात बहुत हो गई, अब सोने दो इसे।"

पर ये दीपक कहता है — "मेरा काम जलना है, हिसाब नहीं।
किसने देखा, किसने सराहा, इसका लेखा-जोखा मेरे पास नहीं।"

मैंने उस कोने को उजाला दिया, जहाँ कोई आता ही नहीं था।
मैंने उस बच्चे की किताब रोशन की, जो आधी रात तक पढ़ता था।

मैंने बूढ़े के चश्मे पर रौशनी डाली, जब वो गीता का श्लोक ढूंढता था।
मैंने रोते हुए मन को सहारा दिया, जब दुनिया ने कहा "तुम अकेले हो।"

तेल के लिए रोया नहीं कभी, हवा से शिकायत नहीं की।
क्योंकि मुझे पता है — बुझना मेरा धर्म नहीं, जलना मेरा कर्म है।

आज अगर मैं छोटा हो गया हूँ, तो क्या हुआ?
पहले वाले दीपक से ही तो ये सारे घर रौशन हुए हैं।

इसलिए हे ईश्वर, तेल कम सही, बाती छोटी सही,
पर लौ को बुझने मत देना।
क्योंकि किसी के अंधेरे में अभी मेरे उजाले की जरूरत है।

दीपक जलता रहे...
चाहे कमरे में कोई न हो, चाहे तारीफ कोई न करे।

दीपक जलता रहे।
क्योंकि जलना ही दीपक की प्रार्थना है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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