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छलनी में पानी

                
                                                         
                            "छलनी में पानी"
                                                                 
                            

थोड़ा सा सम्मान मिला तो, पागल होकर इतराए,
थोड़ा सा धन हाथ आया तो, खुद को सबसे ऊपर पाए।

थोड़ा सा ज्ञान की बूंद मिली, उपदेशों की दुकान सजी,
थोड़ा सा यश का दीप जला, दुनिया पर हंसी गूंजी।

थोड़ा सा रूप मिला जब, तो दर्पण भी तोड़ दिया,
थोड़ा सा अधिकार मिला तो, दूसरों को मसल दिया।

तमाम उम्र यूँ ही बीती, छलनी में पानी भरते,
और समझे हमने कितना, बड़ा काम है कर डाला।

आत्मा तो जानती सदा, क्या सही क्या गलत है,
चुनौती बस इतनी है, मन को कौन समझाता है।

भ्रम की आंधी आती है, रिश्तों को बिखरा जाती,
प्रेम की एक बूंद पड़े, तो अजनबी भी जुड़ जाती।

समर्पण करना कठिन नहीं, मुश्किल बस इतना है,
जो कद्र करे समर्पण की, ऐसा इंसां मिलना है।

एक दिन किताब लिखेंगे, ज़िंदगी का हिसाब रखेंगे,
बदलते अपनों के लहज़े, और टूटे ख्वाब लिखेंगे।

जो हालात ने सिखाया, जो दिल ने सहा है,
जो कह न पाए होंठों से, वो सारे जज़्बात लिखेंगे।

ज़िंदगी पर किताब लिखेंगे, हर पन्ने पर सच रखेंगे,
और अंत में इतना लिखेंगे — "इंसान बनकर जिए थे"।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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