बचपन नींव है जीवन की, आदतें यहाँ सिखाओ,
जो बीज यहाँ बो दोगे, वही कल को फल पाओ।
गुरु की आज्ञा मानी जिसने, वही विद्या पाता है,
जैसे अर्जुन धनुर्धर बना, राम ने आत्मज्ञान पाता है।
चरित्र शब्दों का खेल नहीं, ये व्यवहार से झलके,
दिखावा कुछ दिन चल जाए, पर सच अंत में निकल के।
सच्चा वही जो मन-वाणी-कर्म से किसी को दुख न दे,
सच भी बोले मीठे बोल, निंदा-चोरी का भाव न ले।
न मान की लालसा रखे, न ईर्ष्या-द्वेष को पाले,
स्नान से तन धुले तो, मन धुले वैर मिटा ले।
धीरज धरे, सहनशील रहे, सुख-दुख में सम रहे,
दूसरे का मत भी सुने, भूल को नरमी से कहे।
किसी का उत्साह न तोड़े, किसी का दिल न तोड़े,
सुदामा-कृष्ण सी मित्रता, विपत्ति में साथ न छोड़े।
चरित्र सबसे बड़ी सम्पदा, तन मिटे पर ये न मिटे,
धन-सत्ता सब छूट जाए, पर कीर्ति इसकी न घटे।
जिसके पास चरित्र नहीं, वो बाहर से महान लगे,
भीतर शांति नहीं मिले, भविष्य भी अनजान सजे।
पुण्य बिना संत न मिलते, संत बिना ईश्वर नहीं,
सच्चरित्र से ही खुलता, परमात्मा का द्वार यहीं।
सार एक ही है:
ब्रह्मज्ञानी को आदर्श बना, खुद को खुद तराशो,
चरित्र की पूंजी लेकर, जीवन को रोशन बनाओ।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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