"अपना दीया"
ख्वाहिशों से नहीं गिरते फूल कभी झोली में,
कर्म की शाखा को हिलाना पड़ता है हौसले में।
कोसने से अँधेरा मिटता नहीं कभी जग में,
अपने हिस्से का दीया खुद जलाना पड़ता है मग में।
कौआ चाहे जितना शोर मचाए डाली पर,
कोयल की मधुर तान वो ला नहीं सकता स्वर में।
दबा तो सकता है वो कोयल की आवाज़ को,
पर खुद की आवाज़ मीठी बना नहीं सकता ज़ोर से।
ठीक इसी तरह निंदा करने वाला इंसान,
सज्जन को बदनाम कर ले कुछ पल को बेईमान।
कीचड़ उछाल दे चाहे चाँद के दामन पर,
खुद सज्जन बन नहीं सकता वो अपने कर्म से।
अगर खुश रहना है तो ये उसूल याद रखना,
फैसले अपनी धरती देखकर तुम खुद ही करना।
दुनिया के आईने में जो अपनी राह चुने,
वो हमेशा उलझन में, दुख के साए में सिमटे।
इसलिए शाखा हिलाओ, दीया जलाओ, गीत गाओ,
दूसरों की नकल में अपनी पहचान मत गँवाओ।
कर्म की धूप में तपकर ही फूल खिलते हैं,
और अपने बल पर जीने वाले ही असल में जीते हैं।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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