हे ईश्वर, तुम हृदय में बसे, तुम ही द्रष्टा-साक्षी हो,
तुम्हारी इच्छा से सृष्टि चले, तुम्हारी मर्जी से थमती हो।
एक पत्ता भी न हिले, जब तक आज्ञा न हो तुम्हारी,
तुम शक्ति के सागर हो, करुणा की धारा न्यारी।
प्रभु! दिया मन जो तुमने, बड़ा चंचल ये भारी,
रेत सा हाथों से फिसले, बांधें लाखों बारी।
समझाएँ बार-बार इसे, पर विषयों में लिपटे,
निंदा-चुगली, लालच-क्रोध, अहंकार में सिमटे।
इसी खींच-तान में अपना, धैर्य-साहस खो बैठे,
थक कर अब तेरे द्वारे, बल माँगने को आए।
हे बलदायक! बल दीजिए, ऐसा अटूट धैर्य दीजिए,
मन को साधने का संकल्प, कभी न टूटे ये दीजिए।
तेज दीजिए, विवेक दीजिए, इन्द्रियों पर विजय का,
साहस दीजिए प्रभु, कि हार न मानें कभी जरा।
हे मार्गदर्शक! तुम भीतर ही, सदा विराजमान हो,
मन-बुद्धि-इन्द्रियों को, अपने चरणों में मोड़ दो।
विषय की ओर भागे जो, उसे तुम लौटा देना,
भटके चेतन को अपने में, स्थित करके रख देना।
जब मन डोले भव-सागर में, तुम पतवार बन जाना,
जब अंधकार घिरे जीवन में, तुम दीपक बन आना।
क्योंकि शब्द से नहीं प्रभु, कर्मों से पूजा होती,
और पूजा तब सच्ची है, जब चेतना तुममें सोती।
इसलिए ये माँग हमारी, और कोई नहीं और,
मन जीते, इंद्रिय जीते, तुममें लीन हो जाएँ,
"मैं शरीर नहीं हूँ", इसमें भी बस तुम ही तुम हो,
बस इतना जान पाएँ।
--- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
स्वरचित मौलिक रचना
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