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अब बात नहीं होती

                
                                                         
                            "अब बात नहीं होती"
                                                                 
                            

जिस इंसान से हर बात कहता था,
सुबह की चाय से रात के सपने तक,
आज उससे कोई बात नहीं होती।
शब्द जुबाँ पर आकर लौट जाते हैं,
और सीने में एक चिट्ठी अधूरी रह जाती है।

रिश्ता खत्म होने का दर्द कम है,
उसके चले जाने का मलाल भी कम है।
क्योंकि बिछड़ना तो दुनिया का दस्तूर है।
पर ये जो भीतर एक आवाज़ है —
"उसे बताऊँ क्या?"
उसका जवाब न मिलना...
यही सबसे बड़ा कसूर है।

पहले छोटी-छोटी बातें भी पहाड़ लगती थीं,
और वो हँसकर कहती थी "छोड़ो न"।
आज बड़े-बड़े तूफान आते हैं,
और मैं खुद से कहता हूँ "छोड़ो न"।
पर वो "छोड़ो न" कहने वाली ही नहीं है।

दरार दीवार में हो तो भर जाती है,
पर शब्दों की दीवार गिर जाए तो
उस पर प्लास्टर नहीं चढ़ता।
अब खुशी हो तो आधी लगती है,
दुख हो तो दोगुना लगता है।
क्योंकि बाँटने वाली पता नहीं कहाँ है।

तर्क कहता है — "जो गया सो गया,
आगे बढ़ो, खुद से बात करो"।
पर मन कहता है —
"बरसों बच्चों को भूगोल पढ़ा दिया,
पर इस एक खालीपन का नक्शा नहीं बना पाया"।

इसलिए अब मैं कागज़ से बात करता हूँ,
रात को चाँद से बात करता हूँ,
और उस ईश्वर से बात करता हूँ
जो कहता है — "मैं सुन रहा हूँ"।

शायद एक दिन ये दर्द भी शब्द बन जाए,
और कोई और पढ़कर कहे —
"मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था"।
तब समझूँगा, बात न होना भी
किसी और के लिए बात बन गया।

जिससे हर बात कहता था,
आज उससे कोई बात नहीं होती...
पर अब हर बात एक कविता हो जाती है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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