शरीर रहते ही जो सीख ले संयम की रीत,
काम-क्रोध का वेग सहन करे वही योगी जीत।
क्रोध आना हाथ नहीं, पर रोकना हाथ में है,
क्षण का आवेश बुद्धि हर ले, यही घात में है।
तुरत जुबाँ से निकला शब्द, तीर सा चुभ जाता,
बोला हुआ लौटे नहीं, रिश्ते को तोड़ जाता।
गुस्से में लिया फैसला, बाद में पछतावा दे,
जली हुई राख पर फिर, कोई दीप नहीं बहे।
गीता कहती साफ यही, वही सुखी नर जानो,
वेग उठे भीतर जब, साँसों से उसे पहचानो।
रुको एक पल, गिनो श्वास, पानी को पी जाओ,
क्रोध की अग्नि बुझ जाए, मन को शांत कर जाओ।
जहाँ क्रोध पर विराम लगा, वहीं विजय का द्वार,
स्वयं पर शासन कर लिया, समझो पाया उपहार।
बाहरी जग जीते बहुत, भीतर हारे बारम्बार,
जिसने मन को साध लिया, वही सच्चा सरदार।
वेग नहीं जो बहा दे, वही धीर कहलाता,
क्रोध को जो मोड़ दे, वही शांति को पाता।
इसलिए पथ पर चलते, यह पाठ सदा दोहराओ,
पहले खुद को जीतो, फिर जग को जीत पाओ॥
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X