जल, जंगल और जमीन यही उनकी शान है,
इसी में बसी है उनके जीवन की पहचान है।
अधिकार बचेगा तो बचेगा उनका मान है,
समाधान का सबसे पहला यही विधान है।।
कानून किताबों में नहीं, धरातल पर आए,
पाँचवीं अनुसूची का दीप हर गाँव जलाए।
वन अधिकार अधिनियम अब सख्ती से लागू हो,
जमीन से कोई आदिवासी बेघर न लागू हो।।
विस्थापन के नाम पर अब छल बंद करो,
जंगल से उनका रिश्ता प्रबल, अटल करो।
जल उनका, जंगल उनका, जमीन भी उनकी,
नीति बनाओ ऐसी कि लगे जमीन अपनी।।
शिक्षा हो उनकी भाषा में, उनकी बोली में,
संस्कृति सजे हर अक्षर की रंगोली में।
एकलव्य विद्यालय हर कोने में खुल जाए,
हर आदिवासी बच्चा ज्ञानी-गुणी बन जाए।।
वन-धन केंद्रों से बाजार तक राह बने,
महुआ, तेंदू, शहद का भी सही दाम मिले।
बिचौलियों का जाल अब पूरी तरह टूटे,
मेहनत का फल सीधा उनके हाथों में जुटे।।
साहूकारों के चंगुल से अब मुक्ति दिलाओ,
सहकारी बैंकों से आसान ऋण पहुँचाओ।
रोजगार हो ऐसा जो संस्कृति को बचाए,
शहर की ओर नहीं, गाँव में ही रचाए।।
दूर दराज बस्ती में स्वास्थ्य-दीप जले,
मोबाइल मेडिकल यूनिट हर द्वार चले।
स्थानीय स्वास्थ्य रक्षक हर गाँव में हो,
माँ-बच्चे का जीवन सुरक्षित, पाँव में हो।।
नाच-गीत, ढोल-मांदल उनकी आत्मा है,
संस्कृति ही उनके जीवन की परमात्मा है।
रूढ़ि नहीं, यह ज्ञान की गहरी खान है,
इसे बचाना ही सच्चा हिन्दुस्तान है।।
न दया चाहिए उनको, अधिकार चाहिए,
बराबरी का, सम्मान का संसार चाहिए।
सहानुभूति नहीं, अब साथ चलना होगा,
कंधे से कंधा मिलाकर हाथ बढ़ाना होगा।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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