मंजिल तक का सफर
मैं था एक अजनबी परिंदा,
बैठा था बबूल की छाँव।
कोशिश की मुझे गिराने की,
पर मैंने नहीं मानी हार।
मैं था एक पंखी परिंदा,
मैं गिरा नहीं, उड़ता गया।
आकाश की ओर बढ़ता गया,
हर मुश्किल से लड़ता गया।
रोका मुझे हवाओं के झोंके ने,
पर साथ दिया मेरे पंखों ने।
मैं फिर संभला एक नई चाहत से,
नई उम्मीद और नई आहट से।
उड़ा मैं बादलों को चीरकर,
रुका नहीं किसी मोड़ पर।
आसमान का सफर कठिन था,
पर हिम्मत थी मेरे साथ हर डगर।
मुश्किलों ने मुझे बहुत रोका,
हालातों ने भी खूब परखा।
फिर भी मैंने कदम नहीं रोके,
मंजिल पाने का सपना नहीं छोड़ा।
आखिर मेरी हिम्मत रंग लाई,
मेहनत ने अपनी राह दिखाई।
जो सफर कठिन था कभी,
वही मुझे मंजिल तक ले आया।
-जगदीश कुमार
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