लाखों हैं कमी मुझमें, लेकिन है एक एहसास,
हज़ारों गलतियाँ की मैंने,
पर सुधारने की है एक आस।
टूटा मैं कई बार,
पर खनक नहीं छोड़ी एक बार।
जुड़ा मैं जोश में,
उड़ा मैं होश में।
गिरा मैं जोश में,
उठा फिर नए होश में।
लाखों हैं कमी मुझमें,
लेकिन है एक एहसास।
सहारा दिया लाखों ने,
छोड़ा मुझे हज़ारों ने।
तोड़ा मुझे अपनों ने,
सुलझाया परायों ने।
कभी अपनों ने दर्द दिया,
कभी गैरों ने विश्वास,
हर अनुभव ने सिखाया मुझको,
जीवन का एक नया एहसास।
लाखों हैं कमी मुझमें,
लेकिन है एक एहसास।
कभी लगा कि हार गया मैं,
कभी लगा कि ज़िंदा हूँ मैं।
फिर भी हिम्मत साथ लिए,
नए रास्ते पर चला मैं।
मिले मुझे ज़हरीले काँटे,
राहों में थे दर्द के साए,
मैं काँटों को हटाता गया,
और कदम आगे बढ़ाए।
मुश्किलों से लड़ता गया,
हर ठोकर से सीखता गया,
गिरकर फिर से उठता गया,
अपने सपनों की ओर बढ़ता गया।
लाखों हैं कमी मुझमें,
पर एक एहसास बाकी है,
अभी तो सफ़र शुरू हुआ है,
मंज़िल की तलाश बाकी है।
- जगदीश कुमार
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