श्री हरि की आशीष से ही, यह जीव मानव बन धरा पर आया,
सनातन ने ही इस आत्मा को, कर्तव्य का कर्म-पथ समझाया॥
अनंतकाल से यह जीव, विभिन्न जीवन-चक्रों से निकलकर,
ईश्वर द्वारा सृजित उत्कृष्ट कृति बनकर, हुआ जब आत्मनिर्भर॥
अब इस जीवन में स्वयं के ही, आत्म-विवेक से निर्णय होना है,
भवसागर की लहरों से, क्या प्राप्त करना है और क्या खोना है॥
युग-युग तक कभी भी यहाँ, वैभव एवं ऐश्वर्य स्थिर नहीं रहा है,
यह जीवन-चक्र तो जलधारा की भांति, सदा ही अविरल बहा है॥
मानव से तो सदैव श्री हरि ने भी, अति वात्सल्य-प्रेम किया है,
जब भी ज्ञान दिया नारायण ने, तो वह नर रूप में ही दिया है॥
समझना बस इतना ही है, अंत में स्वयं के साथ ही स्वजनों को,
कब तक पूर्ण करते रहेंगे, इस मृत्यु लोक के अपूर्ण सपनों को॥
यदि इस मानव-मन को, आत्मा से परमात्मा तक लेकर जाना है,
तो भूलकर इस नश्वर आवरण को, परम सत्ता में ही खो जाना है॥
— जगदीश हाड़ा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X