जितना तुम पिलाते हो मयखाने में,
उतना तो हम छोड़ देते हैं पैमाने में।
पीकर तुम्हारा ग़म हल्का नहीं होने वाला,
ग़म और गहरे उतरते हैं जाम उठाने में।
तुम उम्र गुज़ार रहे हो दर्द बताने में,
हमने उम्र गुज़ार दी दर्द छुपाने में।
तुम्हारी उम्र गुज़र रही रिश्ते आज़माने में,
हमने उम्र गुज़ार दी रिश्ते बचाने में।
सफ़र में रास्ते कभी ख़त्म नहीं होते मगर,
हम लगे रहे उम्र भर रास्ता बनाने में।
.... जगदीश चंद्र कापड़ी
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