सर्द हवाओं में सफेद चादर ओढ़कर,
धूप से मुँह मोड़कर,
गुमसुम-सी सुबह को आते देखा।
ओस की बूँदों को पत्तों पर सजाते,
ठिठुरते पेड़ों को धीरे-धीरे जगाते,
कोहरे की चादर को पल-पल हटाते,
बंद पलकों को रोशनी से जगाते,
एक नई उम्मीद को साथ लाते—
गुमसुम-सी सुबह को आते देखा।
कब सुबह, कब दुपहरिया,
कब शाम की रंगीनियाँ,
समय के फेर में सबको घुमाते,
हर पल को नया रूप दिखाते,
बीतते लम्हों को पीछे छोड़ जाते—
समय को यूँ ही बदलते देखा।
कौन है आगे, कौन है पीछे,
किसके हाथों में डोर है खींचे?
कोई न जाने कहाँ कौन पहुँचे,
फिर भी सबको आगे बढ़ाते,
जीवन की राहों पर कदम बढ़ाते—
कपकपाती ठंड में मुस्कुराते,
एक नई सुबह को आते देखा।
कहीं चूल्हे की आग जलाते,
कहीं चाय की चुस्की लगाते,
कोई रजाई में खुद को छिपाते,
कोई रोज़ी की खातिर घर से निकल जाते,
मुश्किल हालातों में भी हँसते-मुस्कुराते—
ज़िंदगी को यूँ ही चलते देखा।
सूरज भी बादल में छिप जाता,
कोहरा हर ओर नज़र आता,
फिर भी अँधेरा कब तक टिक पाता?
एक किरण आती, सबको जगाती,
उम्मीद का दीपक दिल में जलाती—
सर्द हवाओं में भी मुस्कुराती,
एक नई सुबह को आते देखा!
— जगदीश चंद्र कापड़ी
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