"दशहरे में तुम घर आ जाना।
रामलीला में लक्ष्मण हूँ, तुम राम बन जाना।"
भाई का ख़त आया था।
"नहीं आ सकता भाई।
दोस्तों से करना भरपाई।"
मैंने यही जवाब दिया था।
"रक्षाबंधन में छुट्टी आना।
छोटी बहन का हो रहा रोज राखी ले आना।"
बहन का खत आया था।
"छुट्टी नहीं मिल रही है, बहना।
खत में भेज देना, छोटी को भी कहना।"
मैंने यही जवाब दिया था।
"दीपावली में तू घर आना।
बहुत दिन हो गये तुझे देखें, तू आना।"
माँ का ख़त आया था।
"दीप जला देना माँ रक्षा का।
मेरे नहीं देश की सुरक्षा का।"
मैंने यही जवाब दिया था।
"होली में तुम अबिलंब आना।
अब नहीं चलेगा तुम्हारा बहाना।"
भार्या का खत आया था।
"इल्म नहीं सजनी तुझे मैं हूँ, कहाँ।
दुश्मन के लहू से खेल रहे होली यहां।"
मैंने यही जवाब दिया था।
"सैनिक तुझे मेरा अभिवादन"
बेफिक्र रहना, घर का मैं कर रहा परिपालन।"
पिता श्री का खत आया था।
"पहले भारत माँ फिर अपनी माँ।
पीठ नहीं दिखाना कर्तव्य तू निभाए जा।"
पिता श्री का खत आया था।
"कामयाबी मिलेगी तुम्हें शीघ्र ही।
दुआएं साथ हैं, पूरे राष्ट्र की।"
पिता श्री का खत आया था।
"मैं तिरंगा कभी झुकने नहीं दूंगा।
दुश्मन को जीते जी, जीतने नहीं दूंगा।"
मैंने यही जवाब दिया था।
"पिताश्री करो महायज्ञ की तैयारी।
अन्याय की हर चिंगारी, बने आहुति हमारी।
शत्रु के हर दंभ को राख करेंगे हम।
अब वतन की रक्षा की है, बारी हमारी।"
मैंने यही जवाब दिया था।
"देता हूं आपको एक बड़ी जिम्मेदारी।
गांव का बच्चा-बच्चा, बना दो क्रांतिकारी।"
मैंने यही जवाब दिया था।
मैंने यही जवाब दिया था।
-जगदीश चंद्र कापड़ी
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