मैं अगर गूंगा भी हूँ, तो बोलना सीख जाऊँगा।
मुझे माइक दो, चमचे दो, मुंह खोलना सीख जाऊँगा।
रहो मुझसे खफा, मगर उसमें भी फायदा मेरा हो।
तुम लाख दुश्मनी करो, मैं झुकना सीख जाऊँगा।
महफिल में जितने शायर हैं, आओ, घेरो मुझे।
मैं अनपढ़ भी हूं, तो लिखना सीख जाऊँगा।
हसीना-ए-ख्वाब दिखी जो नजरों से गुजर कर।
मैं लंगड़ा भी हूँ, तो चलना सीख जाऊँगा।
जो सीखा है ठोकरों से वो किताबों में कहां।
पैर जमीन पर हैं, जमी को पढ़ना सीख जाऊँगा।
रोज होगा मेरा सूरज से मिलना, हाथ मिलाना।
लेकर हौसला जब आसमां में उड़ना सीख जाऊँगा।
हवाओं से कहो - मेरी रफ्तार देखो, सच बताओ।
क्या मैं कभी, तूफानों से लड़ना सीख जाऊँगा?
... जगदीश चंद्र कापड़ी
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