आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं अनकहे एहसासों की मिसाल बन जाता हूँ।

                
                                                         
                            दिलों में जो दबा है, उसको कह जाता हूँ,
                                                                 
                            
मैं आँसू हूँ, चेहरों की कहानी कह जाता हूँ।

लाख कोशिश कर लो छुपाने की ज़माने से,
मैं दर्द का हिमालय हूँ, आँखों से बह जाता हूँ।

कभी माँ की आँखों में बेटे को देखकर छलकता हूँ,
वर्षों बाद जब मिलते हैं, खुशी से बह जाता हूँ।

कभी हँसते-हँसते आँखों से निकल पड़ता हूँ,
खुशियों का राज़ अपनों से कह जाता हूँ।

कभी प्रेम की गहराई में चुपचाप उतरता हूँ,
कभी बिछड़े हुए अपनों की यादों में बह जाता हूँ।

मैं कमज़ोरी नहीं हूँ, मुझे कमज़ोर मत समझना,
जहाँ इंसान टूटता है, मैं वहीं हिम्मत बन जाता हूँ।

जो बातें होंठ कहने से हमेशा डरते रहते हैं,
मैं आँखों की भाषा बनकर उन्हें कह जाता हूँ।

मुझमें और पानी में बस इतना-सा अंतर है,
पानी प्यास बुझाता है, मैं एहसास कह जाता हूँ।

कभी आँचल भिगोता हूँ, तो कभी रूमाल,
जहाँ भावना से मिलता हूँ, सावन बन जाता हूँ।

न मेरा कोई रंग है, न कोई जात मेरी है,
दर्द और खुशी जहां ज्यादा हो, बह जाता हूँ।

कुछ ऐसे दर्द होते हैं, जिन्हें शब्द मिलते नहीं,
मैं उन अनकहे भावों की आवाज़ बन जाता हूँ।

और जब कोई पूछे—“क्यों नम हैं ये आँखें?”
मैं खामोश रहकर भी बहुत कुछ कह जाता हूँ।

मैं आँसू हूँ—हँसी में भी, खुशी में भी, ग़म में भी,
जहाँ दिल महसूस करता है, मैं वहीं ठहर जाता हूँ।

जब छूकर निकलती है कोई याद दिल से,
मैं अनकहे एहसासों की मिसाल बन जाता हूँ।
— जगदीश चंद्र कापड़ी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर