दिलों में जो दबा है, उसको कह जाता हूँ,
मैं आँसू हूँ, चेहरों की कहानी कह जाता हूँ।
लाख कोशिश कर लो छुपाने की ज़माने से,
मैं दर्द का हिमालय हूँ, आँखों से बह जाता हूँ।
कभी माँ की आँखों में बेटे को देखकर छलकता हूँ,
वर्षों बाद जब मिलते हैं, खुशी से बह जाता हूँ।
कभी हँसते-हँसते आँखों से निकल पड़ता हूँ,
खुशियों का राज़ अपनों से कह जाता हूँ।
कभी प्रेम की गहराई में चुपचाप उतरता हूँ,
कभी बिछड़े हुए अपनों की यादों में बह जाता हूँ।
मैं कमज़ोरी नहीं हूँ, मुझे कमज़ोर मत समझना,
जहाँ इंसान टूटता है, मैं वहीं हिम्मत बन जाता हूँ।
जो बातें होंठ कहने से हमेशा डरते रहते हैं,
मैं आँखों की भाषा बनकर उन्हें कह जाता हूँ।
मुझमें और पानी में बस इतना-सा अंतर है,
पानी प्यास बुझाता है, मैं एहसास कह जाता हूँ।
कभी आँचल भिगोता हूँ, तो कभी रूमाल,
जहाँ भावना से मिलता हूँ, सावन बन जाता हूँ।
न मेरा कोई रंग है, न कोई जात मेरी है,
दर्द और खुशी जहां ज्यादा हो, बह जाता हूँ।
कुछ ऐसे दर्द होते हैं, जिन्हें शब्द मिलते नहीं,
मैं उन अनकहे भावों की आवाज़ बन जाता हूँ।
और जब कोई पूछे—“क्यों नम हैं ये आँखें?”
मैं खामोश रहकर भी बहुत कुछ कह जाता हूँ।
मैं आँसू हूँ—हँसी में भी, खुशी में भी, ग़म में भी,
जहाँ दिल महसूस करता है, मैं वहीं ठहर जाता हूँ।
जब छूकर निकलती है कोई याद दिल से,
मैं अनकहे एहसासों की मिसाल बन जाता हूँ।
— जगदीश चंद्र कापड़ी
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