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माँ के इतवार

                
                                                         
                            कलमकार वहीं निकले आज अखबार के।
                                                                 
                            
ठेकेदार थे, जो कल तक सरकार के।

मुखबिर बोला - "दीवारों के कान होते हैं।"
मैंने पूछा - "किसने देखे, कान कभी दीवार के?"

सच लिखा और दुश्मन कमाए उम्र भर।
बिक गए कितने कलमकार, बंद दरबार के।

सच को जंजीरों में बांधने वालों सुन लो।
तुम्हारे ये झूठ ही तोडेंगे, ताले तुम्हारे द्वार के।

बाई बनकर रहती है, अपने ही घर में हर माँ।
दम है तो लौटा दो, उनके हिस्से इतवार के।
-जगदीश चंद्र कापड़ी
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2 महीने पहले

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