मुझमें कितने ऐब हैं, बताऊँ क्या?
कितना भरा हूं भीतर से, सुनाऊँ क्या?
चाहत, नफरत, जोश, जुनूं और गुरूर।
दिल में क्या-क्या है, यार गिनाऊँ क्या?
हर तरफ चेहरे हैं, चेहरे में नकाब है।
बनकर आईना, नकाब सबके उतारूँ क्या?
मेरे दिल में जितनी आग है, उतना धुआँ है।
यह धुआँ खुद उड़ेगा, आग भड़काऊ क्या?
यहाँ पर हर किसी ने अपनी-अपनी बात रखी।
मैं कैसे तोलूं अपनी बातें, हिसाब बताऊँ क्या?
लहू से लिखा है, मैंने एक गजल, दर्द का।
चुरा के किसी की गजल, तमाशा बनाऊँ क्या?
लब्जों को इबादत मानता है, "जगदीश"
तालियों के खातिर, जमीर बेच आऊँ क्या?
... जगदीश चंद्र कापड़ी
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