नया इंसान बनाना है, खुद को तोड़ दूँगा,
काफ़ी टूटा-फूटा हूँ मैं, खुद को जोड़ दूँगा।
मेरी ख़ामोशी को कमज़ोर मत समझना,
चुप रहने दो, बोलूँगा तो कई राज़ खोल दूँगा।
एक हाथ में गुलाब, दूजे में तलवार रखूँगा,
फ़क़त ख़ुशबू का व्यापार करना छोड़ दूँगा।
मुझे परवाह नहीं कि प्यासा कौन रहेगा,
मैं तो दरिया हूँ, अपना रास्ता मोड़ दूँगा।
ये मिट्टी मेरी है, खेत-खलिहान मेरे हैं,
सोच रहे थे, ऐसे ही सब छोड़ दूँगा?
बेटा, कहानी कभी ख़त्म नहीं होगी,
जाते-जाते तेरे लिए आग़ाज़ छोड़ दूँगा।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
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