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कंगाल रह गया

                
                                                         
                            सफ़र में सब मिला, खुशियों का अकाल रह गया,
                                                                 
                            
झूठ बोलने वाले अमीर हुए, मैं कंगाल रह गया।

खुद को बिखेरा आज तक जिन्हें तराशने के लिए,
जवाब उनकी जुबान पर थे, मेरा सवाल रह गया।

दाँव लगाकर सोचा था कि आसमान छू लेंगे,
खुद पर खर्च किया नहीं, बस मलाल रह गया।

अकेला भीड़ से लड़ पड़ा जिसके लिए कभी,
वही शख़्स मेरी ज़िंदगी का जंजाल रह गया।

बेरहम मौसम आया तो घर में दुबक गए,
जाऊँ भी कहाँ, कैदी-सा मेरा हाल रह गया।

ज़िंदगी में, 'जगदीश', हारा बहुत कुछ मगर,
तजुर्बे मिले इतने कि मालामाल रह गया।
-जगदीश चंद्र कापड़ी
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2 महीने पहले

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