इंसान डराने लगे, भूतों ने डराना छोड़ दिया,
जब से दादा-दादी ने किस्से सुनाना छोड़ दिया।
रोती रहीं किताबें अलमारी के कोनों में,
मोबाइल से दोस्ती हुई, पढ़ना छोड़ दिया।
मोबाइल में घंटों डूबे रहते हैं अब बच्चे,
हमने भी उन्हें राम-कथा सुनाना छोड़ दिया।
उड़ने दो मिट्टी को धूल बनकर हवाओं में,
धूल ने भी जैसे ज़मीं पर आना छोड़ दिया।
मिठाइयों की चकाचौंध में ऐसे खो गए लोग,
नीम की कड़वी पत्तियाँ चबाना छोड़ दिया।
अंकुरित हैं फल अब बेमौसम शाखों पर,
फलों ने भी मौसम से घबराना छोड़ दिया।
रिश्तों में दरारें बढ़ती रहीं मगर अफ़सोस,
दिल का हाल एक-दूजे को बताना छोड़ दिया।
घर में सब अकेले हैं, सबके अपने कमरे हैं,
जब से जमीन पर एक साथ खाना छोड़ दिया।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
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