मुझे बर्बाद कब से किया? तू हिसाब तो दे।
मैं तुझे पढ़ूं कैसे? कोई तेरी किताब तो दे।
मेरे हिस्से में जो कुछ बचा है वो भी रख ले।
मगर आंखों से आंखें मिला, कुछ जवाब तो दे।
तेरी मुस्कान में दफन है, कई राज, कई दाग।
चेहरे के आगे, जो चेहरा है, उसका नकाब तो दे।
उम्र भर बुनता रहा ख्वाब तेरी बफा के धागों से।
अब बेवफा है, तो है, कोई वफा का ख्वाब तो दे।
तेरा ही कब्जा है, फूलों पर, शबनम पर।
चल, तू कांटे छिपा कर दे, एक गुलाब तो दे।
सदाकत तेरी ये है कि तेरा झूठ बिक नहीं रहा।
मैं सच बोलूंगा, पहले मुझे शराब तो दें।
...- जगदीश चंद्र कापड़ी
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