आँखों में रौशनी लिए, अँधेरों में क्या ढूँढ़ते हैं?
जन्नत में हैं, मगर जहन्नुम की ओर मुड़ते हैं।
बड़ी तब्दीली आई है आजकल इश्क़ में,
दिल सीने के बजाय आँखों में धड़कते हैं।
इस दौर में ख़ामोश रहना भी बड़ा हुनर है,
जो ज़ुबाँ खोलते हैं, वही खटकते हैं।
नुस्ख़ा है कमाने का कुछ डॉक्टरों का,
इलाज कम, मरीज़ ज़्यादा पकड़ते हैं।
अब वार तलवार से नहीं, मुस्कानों से होते हैं,
मौत से नहीं, इंसान ज़िंदा होने से डरते हैं।
मैं अगर सच बोल दूँ, तो बाग़ी कह देंगे,
झूठ बोल दूँ, तो मुझे रहबर समझते हैं।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
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