बँटो,
बँटो,
इतना बँटो कि
खून का रंग भी
बँट जाए,
पीला, नीला,
सफेद, काला
आदि आदि,
और जाति का रंग
केवल लाल रखो।
बँटो
इतना बँटो कि
धज्जियां उड़ा दो
प्रकृति के नियमों की,
पुरुषों को स्त्री में,
स्त्री को पुरुष में,
फिर भी तृप्त न हो मन,
तो किन्नरो में बँटो,
मगर बँटो।
अभी बंटने की
संभावनाएं भरपूर है।
इतना बँटो कि
आकर्षण बल भी
शर्म के मारे
प्रतिकर्षण बल में
परिवर्तित हो जाए।
कुछ यूं बँटो
जीव को धर्म में,
प्रेम को व्यापार में,
रिश्तों को व्यवहार में,
और समाज को दीवारों में,
फिर भी मन न भरे,
तो इंसान को इंसान से बाॅट दो।
बँटो,
पर अकेले मत बँटो,
बेशर्मी के साथ बँटो
बेदर्दी के साथ बँटो
आने वाली पीढ़ियां
तुमसे सीख रही हैं,
बंटने के व्यवहार में
तुम्हें विश्व गुरु होने से,
कोई रोक नहीं सकता।
और
तुम ये यकीन
पुख्ता करते हुए
जरा और ज़्यादा ज़ोर से बँटो,
चारों ओर से बँटो,
शत-प्रतिशत जात-पात में बँटो,
गावं, शहर और पूरी कायनात में बँटो
और बंटते रहो।
बंटवारे पर
शायद ही
कोई मुकदमा चलें,
रोक लगे या सजा हो।
तुम्हें तो खुश होना चाहिए,
कि
समाज में जुड़े लोगों को
तुम बंटना सिखा रहे हो।
लोग जुड़-जुड़कर
चिपक गए थे,
उन्हें खींचकर
जो तुम अलग कर रहे हो,
तुम्हें देखकर कौन कहेगा?
कि तुम डर रहे हो।
तुम बंटते रहो,
लोग आलोचना करेंगे,
निंदा करेंगे,
घबराना नहीं,
बंटने से डगमगाना नहीं।
आज तक
जो न बंटने के लिए
नियंत्रण में था,
उसे लेकर बँटो,
मगर बँटो।
धर्म से बँटो,
कर्म से बँटो
देश में बँटो
विदेश में बँटो
समाज में बँटो,
कल और आज में बँटो
आरक्षण में बँटो,
संरक्षण में बँटो,
पहाड लेकर बँटो,
जुगाड लेकर बँटो,
प्रकृति लेकर बँटो,
संस्कृति लेकर बँटो।
दिखा दो
कि तुम कितना बंट सकते हो।
कल हो सकता है
कि तुम्हारी संपत्ति का भी
आने वाली पीड़ियां
बंदरबांट करें।
और अपने हिस्से में
जो मिला हो
उसे देखकर
अफसोस करें
जिससे पुनः जुडने की कामना उठें।
हाल-फिलहाल
लाख उकसाएं तुम्हें कोई,
मगर अडिग रहो
और बंटते रहो,
जब तक बंटने की प्रक्रिया
निष्क्रिय न हो जाए।।
... जगदीश चंद्र कापड़ी
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